सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

भगवान की लीला अमोध है। वे लीला से ही इस संसार का सृजन, पालन और संहार करते हैं, किंतु इसमे आसक्त नही होते। प्राणियों के अंतःकरण मे छिपे रहकर ज्ञानेंद्रिय और मन के नियंता के रूप में उनके विषयों को ग्रहण भी करते है, परंतु उनसे अलग रहते हैं, वे परम स्वतंत्र है–ये विषय कभी उन्हे लिप्त नहीं कर सकते। जैसे अनजान मनुष्य जादूगर अथवा नट के संकल्प और वचनों से की हुई करामात को नही समझ पाते, वैसे ही अपने संकल्प और वेदवाणी के द्वारा भगवान के प्रकट किये हुये इन नाना नाम और रूपों को तथा उनकी लीलाओ को कुबुद्धि जीव बहुत सी तर्क-युक्तियों के द्वारा नही पहचान सकता।

 भगवान की लीला अमोध है। वे लीला से ही इस संसार का सृजन, पालन और संहार करते हैं, किंतु इसमे आसक्त नही होते। प्राणियों के अंतःकरण मे छिपे रहकर ज्ञानेंद्रिय और मन के नियंता के रूप में उनके विषयों को ग्रहण भी करते है, परंतु उनसे अलग रहते हैं, वे परम स्वतंत्र है–ये विषय कभी उन्हे लिप्त नहीं कर सकते। जैसे अनजान मनुष्य जादूगर अथवा नट के संकल्प और वचनों से की हुई करामात को नही समझ पाते, वैसे ही अपने संकल्प और वेदवाणी के द्वारा भगवान के प्रकट किये हुये इन नाना नाम और रूपों को तथा उनकी लीलाओ को कुबुद्धि जीव बहुत सी तर्क-युक्तियों के द्वारा नही पहचान सकता।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

इसमे कलियुग के दोषों से बचने के उपाये – केवल ‘नामसंकीर्तन’ है। मृत्यु तो परीक्षित जी को आई ही नही क्योकि उन्होने उसके पहले ही समाधि लगाकर स्वयं को भगवान मे लीन कर दिया था। उनकी परमगति हुई क्योकि इस भागवत रूपी अमृत का पान कर लिया हो उसे मृत्यु कैसे आ सकती है। By वनिता कासनियां पंजाब इस पुराण में वर्णाश्रम-धर्म-व्यवस्था को पूरी मान्यता दी गई है तथा स्त्री, शूद्र और पतित व्यक्ति को वेद सुनने के अधिकार से वंचित किया गया है। ब्राह्मणों को अधिक महत्त्व दिया गया है। वैदिक काल में स्त्रियों और शूद्रों को वेद सुनने से इसलिए वंचित किया गया था कि उनके पास उन मन्त्रों को श्रवण करके अपनी स्मृति में सुरक्षित रखने का न तो समय था और न ही उनका बौद्धिक विकास इतना तीक्ष्ण था। किन्तु बाद में वैदिक ऋषियों की इस भावना को समझे बिना ब्राह्मणों ने इसे रूढ़ बना दिया और एक प्रकार से वर्गभेद को जन्म दे डाला।

इसमे कलियुग के दोषों से बचने के उपाये – केवल ‘नामसंकीर्तन’ है। मृत्यु तो परीक्षित जी को आई ही नही क्योकि उन्होने उसके पहले ही समाधि लगाकर स्वयं को भगवान मे लीन कर दिया था। उनकी परमगति हुई क्योकि इस भागवत रूपी अमृत का पान कर लिया हो उसे मृत्यु कैसे आ सकती है। By वनिता कासनियां पंजाब इस पुराण में वर्णाश्रम-धर्म-व्यवस्था को पूरी मान्यता दी गई है तथा स्त्री, शूद्र और पतित व्यक्ति को वेद सुनने के अधिकार से वंचित किया गया है। ब्राह्मणों को अधिक महत्त्व दिया गया है। वैदिक काल में स्त्रियों और शूद्रों को वेद सुनने से इसलिए वंचित किया गया था कि उनके पास उन मन्त्रों को श्रवण करके अपनी स्मृति में सुरक्षित रखने का न तो समय था और न ही उनका बौद्धिक विकास इतना तीक्ष्ण था। किन्तु बाद में वैदिक ऋषियों की इस भावना को समझे बिना ब्राह्मणों ने इसे रूढ़ बना दिया और एक प्रकार से वर्गभेद को जन्म दे डाला।

पंद्रहवी बार वामन का रूप धारण करके भगवान दैत्यराज बलि के यज्ञ में गये। वे चाहते तो थे त्रिलोकी का राज्य, परंतु माँगी उन्होने केवल तीन पग पृथ्वी। सोलहवें परशुराम अवतार में जब उन्होने देखा कि राजा लोग ब्राह्मणों के द्रोही हो गये है, तब क्रोधित होकर पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से शून्य कर दिया। इसके बाद सत्रहवें अवतार में सत्यवती के गर्भ से पराशरजी के द्वारा वे व्यास के रूप में अवतीर्ण हुये, उस समय लोगो की समझ और धारणा शक्ति कम देखकर आपने वेदरूप वृक्ष की कई शाखाएँ बना दी। अठारहवी बार देवताओं का कार्य सम्पन्न करने की इच्छा से उन्होने राजा के रूप मे रामावतार ग्रहण किया और सेतु-बंधन, रावणवध आदि वीरतापूर्ण बहुत सी लीलाएँ की। By वनिता कासनियां पंजाब

 पंद्रहवी बार वामन का रूप धारण करके भगवान दैत्यराज बलि के यज्ञ में गये। वे चाहते तो थे त्रिलोकी का राज्य, परंतु माँगी उन्होने केवल तीन पग पृथ्वी। सोलहवें परशुराम अवतार में जब उन्होने देखा कि राजा लोग ब्राह्मणों के द्रोही हो गये है, तब क्रोधित होकर पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से शून्य कर दिया। इसके बाद सत्रहवें अवतार में सत्यवती के गर्भ से पराशरजी के द्वारा वे व्यास के रूप में अवतीर्ण हुये, उस समय लोगो की समझ और धारणा शक्ति कम देखकर आपने वेदरूप वृक्ष की कई शाखाएँ बना दी। अठारहवी बार देवताओं का कार्य सम्पन्न करने की इच्छा से उन्होने राजा के रूप मे रामावतार ग्रहण किया और सेतु-बंधन, रावणवध आदि वीरतापूर्ण बहुत सी लीलाएँ की। By वनिता कासनियां पंजाब 

भागवत का ‘हृदय’ दशम स्कन्ध है बडे-बडे संत महात्मा, भक्त के प्राण है यह दशम स्कन्ध, भगवान अजन्मा है, उनका न जन्म होता है न मृत्यु, श्री कृष्ण का तो केवल ‘प्राकट्य’ होता है, भगवान का प्राकट्य किसके जीवन मे, और क्यों होता है, किस तरह के भक्त भगवान को प्रिय है, भक्तो पर कृपा करने के लिये, उन्ही की ‘पूजा – पद्धति’ स्वीकार करने के लिये, चाहे जैसे भी पद्धति हो, के लिये ही भगवान का प्राकट्य हुआ, उनकी सारी लीलाये, केवल अपने भक्तो के लिये थी | By वनिता कासनियां पंजाब जिस-जिस भक्त ने उद्धार चाहा, वह राक्षस बनकर उनके सामने आता गया और जिसने उनके साथ क्रिडा करनी चाही वह भक्त, सखा, गोपी, के माध्यम से सामने आते गये, उद्देश्य केवल एक था – ‘श्री कृष्ण की प्राप्ति’ भगवान की इन्ही ‘दिव्य लीलाओ का वर्णन’ इस स्कन्ध मे है जहां ‘पूतना मोक्ष’ उखल बंधन’ चीर हरण’ ‘ गोवर्धन’ जैसी दिव्य लीला और रास, महारास, गोपीगीत तो दिवाति दिव्य लीलायें है। इन दिव्य लीलाओ का श्रवण, चिंतन, मनन बस यही जीवन का सार’ है।

भागवत का ‘हृदय’ दशम स्कन्ध है बडे-बडे संत महात्मा, भक्त के प्राण है यह दशम स्कन्ध, भगवान अजन्मा है, उनका न जन्म होता है न मृत्यु, श्री कृष्ण का तो केवल ‘प्राकट्य’ होता है, भगवान का प्राकट्य किसके जीवन मे, और क्यों होता है, किस तरह के भक्त भगवान को प्रिय है, भक्तो पर कृपा करने के लिये, उन्ही की ‘पूजा – पद्धति’ स्वीकार करने के लिये, चाहे जैसे भी पद्धति हो, के लिये ही भगवान का प्राकट्य हुआ, उनकी सारी लीलाये, केवल अपने भक्तो के लिये थी | By वनिता कासनियां पंजाब जिस-जिस भक्त ने उद्धार चाहा, वह राक्षस बनकर उनके सामने आता गया और जिसने उनके साथ क्रिडा करनी चाही वह भक्त, सखा, गोपी, के माध्यम से सामने आते गये, उद्देश्य केवल एक था – ‘श्री कृष्ण की प्राप्ति’ भगवान की इन्ही ‘दिव्य लीलाओ का वर्णन’ इस स्कन्ध मे है जहां ‘पूतना मोक्ष’ उखल बंधन’ चीर हरण’ ‘ गोवर्धन’ जैसी दिव्य लीला और रास, महारास, गोपीगीत तो दिवाति दिव्य लीलायें है। इन दिव्य लीलाओ का श्रवण, चिंतन, मनन बस यही जीवन का सार’ है।